पहाड़ की पहचान सिर्फ़ उसकी वादियों और नज़ारों से नहीं है, बल्कि यहाँ की संस्कृति और परंपराओं से भी है। पहले गाँव-गाँव में मेला, बग्वाल, जागर, लोक नृत्य जैसे आयोजन धूमधाम से होते थे। लोग एक-दूसरे से जुड़ते थे, रिश्ते मज़बूत होते थे और लोककला को पहचान मिलती थी।
लेकिन अब ये आयोजन कम होते जा रहे हैं। कारण हो सकते हैं:
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युवाओं का पलायन → शहरों में रोज़गार की तलाश
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आर्थिक तंगी → आयोजन के लिए धन की कमी
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डिजिटल युग → अब लोग मनोरंजन ऑनलाइन ढूँढ लेते हैं
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प्रशासनिक सहयोग की कमी
👉 सवाल है:
क्या यह बदलाव हमारी संस्कृति को नुकसान पहुँचा रहा है?
आपके गाँव या कस्बे में आखिरी बार बड़ा मेला या त्योहार कब हुआ था?
🗣️ नीचे अपने अनुभव, फ़ोटो या यादें साझा करें।
आइए, इस चर्चा से जानें कि कैसे हम अपनी संस्कृति को फिर से जीवंत बना सकते हैं। 🌸
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